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लावारिस लाशों के ‘मसीहा’ बने शरीफ चाचा को मिला पद्मश्री, 25000 से ज्यादा लावारिस लाशों का कर चुके अंतिम संस्कार
 
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आज के इस दौर में तेजी से बदल रहे समाज में अच्छे लोगों को ढूंढना बेहद ज्यादा मुश्किल होता जा रहा है। लेकिन इन्हीं लोगों में बहुत से ऐसे भी मौजूद हैं जो अपनी अच्छाई और अपने काम के लिए जाने जाते हैं हाल ही में अच्छे कामों के लिए देश के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद द्वारा कई लोगों को पद्मश्री अवार्ड से सम्मानित किया गया। इनमें ही एक नाम सामने आया अयोध्या के रहने वाले शरीर चाचा का जिन्होंने अपने जीवन के अब तक के करियर में 25000 से ज्यादा लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार किया है।

बता दें कि उन्हें राष्ट्रपति द्वारा समाज सेवा के लिए पद्मश्री अवार्ड दिया गया है। आज भी बहुत से लोग ऐसे मौजूद है जो समाज सेवा को ही नारायण सेवा और सबसे बड़ा कर्तव्य मानते हैं इनमें ही एक नाम आता है शरीफ चाचा का जिन्होंने बिना कोई लालच और बिना कोई धर्म को देखे इस कार्य को आज तक निरंतर करते आ रहे हैं। वहीं उनकी समाज सेवा को देखते हुए उन्हें इतने बड़े सम्मान से नवाजा गया है। आज हर तरफ शरीफ चाचा की चर्चा हो रही है जिस तरह से उन्होंने लावारिस लाशों का बीड़ा अपने कंधे पर लिया है हर कोई उनकी तारीफ कर रहा है।

आज मोहम्मद शरीफ काफी बुजुर्ग हैं और उम्र दराज है लेकिन इसके बाद भी निरंतर 25 सालों से लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार करते आ रहे हैं बता दें कि अयोध्या में उन्हें लावारिस लाशों का मसीहा भी कहा जाता है वह अपने अब तक के करियर में 25000 से ज्यादा लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार कर चुके हैं। कहा जाता है कि जिन लाशों का कोई नहीं होता उनके शरीफ चाचा होते हैं। इसके पीछे की कहानी भी काफी हैरान करने वाली है बताया जाता है कि उन्होंने अपने पुत्र को बहुत ही छोटी उम्र में एक दुर्घटना में खो दिया था।

अपने बेटे की दुर्घटना में मौत और बाद में उसके अंतिम संस्कार को लेकर शरीफ चाचा के दिल में लावारिस लाशों को लेकर विचार आया इसके बाद से उन्होंने लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार करना चालू कर दिया आपकी जानकारी के लिए बता दें कि शरीफ चाचा को यह सम्मान साल 2020 के दौरान ही मिलना था इसके लिए उन्हें पत्र भी मिल चुका था लेकिन कोरोना के कारण उन्हें यह सम्मान नहीं मिल सका आज वह काफी दयनीय स्थिति में अपना जीवन जी रहे हैं उनकी घर की स्थिति भी ठीक नहीं है उनका बेटा गाड़ी चला कर घर का पालन पोषण करता है वहीं शरीफ चाचा भी बीमार रहते हैं।

शरीफ चाचा के घर की हालिया स्थिति इतनी ज्यादा ठीक नहीं है लेकिन इसके बाद भी उन्होंने अपने कर्तव्य से कभी पल्ला नहीं झाड़ा और निरंतर लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार करते आ रहे हैं उनका एक बेटा साइकिल सुधारने का तो दूसरा मोटरसाइकिल सुधारने का काम करता है वही एक गाड़ी चलाता है सभी के काम आने के बाद परिवार चलता है दो वक्त की रोटी मिल पाती है लेकिन इतनी कठोर परिस्थिति के बाद भी शरीफ चाचा अपना कर्तव्य नहीं भूले आज भी वे इस कार्य को कर रहे हैं। समाज में इस तरह के लोग बहुत कम ही देखने को मिलते हैं।