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ISRO में रॉकेट बनाने वाला बनेगा डॉक्टर! दो वजहों से 59 की उम्र में पास किया NEET

इसरो के पूर्व रॉकेट साइंटिस्ट राजन बाबू नीट एग्जाम को फिर से देने वाले हैं, ताकि उन्हें सरकारी मेडिकल कॉलेज में एडमिशन मिल सके.

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ISRO में रॉकेट बनाने वाला बनेगा डॉक्टर! दो वजहों से 59 की उम्र में पास किया NEET

बेंगलुरू के रहने वाले 59 वर्षीय राजन बाबू इसरो में वैज्ञानिक रह चुके हैं. लेकिन अब उनका सपना डॉक्टर बनने का है. उम्र के इस पड़ाव पर उनके डॉक्टर बनने की चाहत जानकर कई लोग हैरान रह जाते हैं. हालांकि, राजन का डॉक्टर बनने का जुनून कुछ ऐसा है कि उन्होंने मेडिकल एंट्रेंस एग्जाम भी क्लियर कर लिया. मगर मनमुताबिक स्कोर नहीं आने पर अब वह अपना स्कोर सुधारना चाहते हैं. राजन बाबू एक बार फिर से नेशनल एलिजिबिलिटी एंट्रेंस टेस्ट (NEET) में हिस्सा लेने वाले हैं, ताकि उनका स्कोर बेहतर हो सके और उन्हें सरकारी मेडिकल कॉलेज मिल सके.

राजन बाबू ने बिट्स पिलानी से कंप्यूटर साइंस में एमएससी किया और फिर ISRO में रॉकेट साइंटिस्ट के तौर पर काम किया. उन्होंने इस साल NEET Exam दिया था. हालांकि, उन्हें अच्छा स्कोर नहीं मिला और अब वह अगले साल फिर से NEET एग्जाम में हिस्सा लेंगे, ताकि उन्हें अच्छा स्कोर मिल सके. इसके साथ ही उन्हें सरकारी कोटे के तहत एमबीबीएस सीट भी हासिल हो सके. यहां गौर करने वाली बात ये है कि राजन बाबू का बेटा और बेटी दोनों ही एमबीबीएस की पढ़ाई कर रहे हैं.

ऐसे शुरू हुआ पढ़ाई का सफर

दरअसल, 1963 में पैदा हुए बाबू पारिवारिक कारणों की वजह से स्कूल नहीं जा सके. परिवार का गुजारा करने के लिए उन्हें छोटी उम्र में ही काम करना पड़ा. लेकिन पढ़ाई की ललक बरकरार रही. 1981 में चीजें बदलने लगीं, जब उनके दोस्त ने उन्हें प्राइवेट उम्मीदवार के तौर पर 10वीं क्लास का एग्जाम देने को कहा.

बाबू ने बताया कि उन्होंने अपनी मां से अल्फाबेट और टेबस जैसी सीखीं. अलग-अलग विषयों की पढ़ाई मैंने खुद ही की. मैंने 10वीं का एग्जाम दिया और मैं पास भी हो गया. वह बताते हैं कि 10वीं की मार्कशीट के आधार पर उन्होंने इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा करने के लिए एडमिशन लिया और फिर साथ ही साथ बॉश कंपनी में पांच साल से ज्यादा वक्त तक काम किया.

उन्होंने बताया कि वर्क एक्सपीरियंस होने की वजह से 1992 में आसानी से एसोसिएट मेंबर ऑफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियर्स (AMIE) एग्जाम पूरा हो गया. उस समय AMIE को BE के बराबर माना जाता था. वह बताते हैं कि उन्होंने इलेक्ट्रिकल इंजीनियर के तौर पर पोस्ट और टेलीग्राफ में दो साल तक काम भी किया.

इसरो में बने साइंटिस्ट

राजन बाबू ने बताया कि पोस्ट और टेलीग्राफ में काम करते हुए उन्होंने इसरो में अप्लाई किया. सिर्फ दो पदों पर वैकेंसी थी, लेकिन एक लाख के करीब लोगों ने अप्लाई किया था. उन्होंने कहा कि वह 1995 में इसरो में चुने गए और रॉकेट साइंटिस्ट के तौर पर काम करने लगे. इसरो में काम करते हुए उन्होंने बिट्स पिलानी से 1999 में एमएससी (कंप्यूटर साइंस) किया. कंप्यूटर साइंस करने के बाद वह अमेरिका में काम करने चले गए और वहां उन्होंने 2007 तक कई सारी कंपनियों में काम किया. 2007 में परिवार के साथ वक्त बिताने के लिए वह फिर से बेंगलुरू लौट आए.

डॉक्टर बनने की दो वजहें

वहीं, बाबू के डॉक्टर बनने की पहली वजह ये है कि जब उनके बच्चों ने एमबीबीएस में एडमिशन ले लिया, तो उन्होंने भी डॉक्टर बनने का सपना देखा. उन्होंने इस साल नीट एग्जाम में हिस्सा लिया, मगर उन्हें 720 में से 449 नंबर मिले. लेकिन सरकारी कोटा के तहत एमबीबीएस सीट पर एडमिशन के लिए ये स्कोर पर्याप्त नहीं थे. अब उनका इरादा 650 नंबर हासिल करने का है, ताकि उन्हें सरकारी मेडिकल कॉलेज में एडमिशन मिल सके.

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दूसरी वजह ये है कि राजन बाबू ने कहा कि वह डॉक्टर बनकर पैसा नहीं कमाना चाहते हैं, बल्कि वह रिसर्च पर फोकस करना चाहते हैं. मैंने देखा कि लोगों को महामारी के दौरान किस तरह प्रभावित होना पड़ा. मेरी मां की मौत भी कोविड की वजह से हुई. वह अस्पताल पहुंचने से पहले ही दुनिया को अलविदा कह गईं. मेडिकल वर्ल्ड को समाज को कुछ देना चाहिए, जो मरीजों की बुनियादी चीजों को पूरा कर सके.

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