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कैसे चुना जाता है देश का चुनाव आयुक्त और सुप्रीम कोर्ट ने क्यों उठाए सवाल?

चुनाव आयुक्त अरुण गोयल की नियुक्ति का मामला चर्चा में है. सुप्रीम कोर्ट ने इस पर सवाल उठाए हैं. जानिए कैसे होती है चुनाव आयुक्त और मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति, क्या हैं इससे जुड़े नियम और नई नियुक्ति पर सुप्रीम कोर्ट का क्या कहना है?

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 कैसे चुना जाता है देश का चुनाव आयुक्त और सुप्रीम कोर्ट ने क्यों उठाए सवाल?

चुनाव आयुक्त अरुण गोयल की नियुक्ति का मामला चर्चा में है. सुप्रीम कोर्ट ने इस पर सवाल उठाए हैं. कोर्ट ने केंद्र सरकार से गुरुवार को अरुण गोयल की नियुक्ति से जुड़ी फाइल मांगी. कोर्ट का कहना है, चुनाव आयुक्त के भर्ती की फाइल बहुत तेजी से पास की गई है. हम उनकी योग्यता पर नहीं, उनकी भर्ती की प्रक्रिया पर सवाल उठा रहे हैं. इस मामले पर 5 जजों की संवैधानिक बेंच ने फैसला सुरक्षित रख लिया है.

1985 बैच के IAS अरुण गोयल ने 18 नवंबर को उद्योग सचिव पद से VRS ले लिया था. इसके बाद 31 दिसंबर उनके रिटायरमेंट की तारीख थी, लेकिन 19 नवंबर को ही उन्हें चुनाव आयुक्त नियुक्त कर दिया गया. 21 नवंबर को उन्होंने पदभार भी संभाल लिया. इतनी तेजी से इनकी नियुक्ति की फाइल आगे बढ़ने पर सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाए.

जानिए कैसे होती है चुनाव आयुक्त और मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति, क्या हैं इससे जुड़े नियम और नई नियुक्ति पर सुप्रीम कोर्ट का क्या कहना है?
Explained: कैसे चुना जाता है देश का चुनाव आयुक्त और सुप्रीम कोर्ट ने क्यों उठाए सवाल?
 

कैसे होती है चुनाव आयुक्त की भर्ती?

संविधान के मुताबिक, चुनाव आयुक्त और मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं. यह नियुक्ति 6 साल के लिए होती है या यह कार्यकाल उनकी 65 साल की उम्र तक रहता है. इन्हें वो वेतन और भत्ते मिलते हैं जो सुप्रीम कोर्ट के के न्यायाधीशों को मिलते हैं. भारतीय चुनाव आयोग को यह अधिकार संविधान अनुच्छेद 324 के तहत मिला है. जिसमें कहा गया है कि चुनावों को कंट्रोल करना, इन्हें आयोजित कराना और नजर रखने की शक्तियां चुनाव आयोग के पास हैं.

कितनी हो सकती है चुनाव आयुक्तों की संख्या?

संवैधानिक तौर पर चुनाव आयोग के सदस्यों की संख्या कितनी होगी, यह बदलती रही है. संविधान का अनुच्छेद 324(2) कहता है कि चुनाव आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्त कितने होंगे, यह समय-समय पर राष्ट्रपति तय करते हैं. चुनाव आयोग की शुरुआत होने पर पर केवल मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति होती थी. हालांकि 16 अक्टूबर, 1989 में राजीव गांधी की सरकार ने दो चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति हुई थी. इस तरह चुनाव आयोग के सदस्यों की संख्या बढ़ गई थी. यह नियुक्ति 9वें लोकसभा चुनाव से ठीक पहले हुई थी. हालांकि इसकी काफी आलोचना की गई थी.

कब-कब बदले नियम

2 जनवरी, 1990 को तत्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने नियम में बदलाव किया और चुनाव आयोग को सिंगल मेम्बर बॉडी बनाया. तीन साल बाद फिर इसमें बदलाव किया गया. 1 अक्टूबर 1993 में तत्कालीन पीवी नरसिम्हा राव ने दो और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए एक अध्यादेश जारी किया. उसके बाद चुनाव आयोग में तीन सदस्य कीनियुक्ति का नियम बना. आयोग से जुड़े निर्णय लेने में तीनों चुनाव आयुक्तों को समान अधिकार दिए गए हैं.

कितनी संवैधानिक है नए चुनाव अयुक्त की भर्ती?

कोर्ट का कहना है, 18 नवंबर को सुनवाई शुरू की गई, उसी दिन नियुक्ति से जुड़ी फाइल को आगे बढ़ा दिया गया. क्लियरेंस भी उसी दिन ही मिल गया. उसी दिन आवेदन गया और उसी दिन नियुक्ति भी हो गई. कोर्ट ने केंद्र से कहा, 15 मई से चुनाव आयोग में पद खाली था. क्या आप 15 मई से 18 नवंबर तक का रिकॉर्ड दिखा सकते हैं कि जिससे पता चल सके कि आपने क्या किया? ऐसी क्या इमरजेंसी की स्थिति थी कि सारा काम एक दिन में पूरा करके नियुक्ति की गई?

फाइल को 24 घंटे तक नहीं लगे. इतनी तेज गति से इसे क्लियरेंस कैसे मिला. पूरे मामले की सुनवाई करते हुए 5 जजों की संवैधानिक बेंच में शामिल जस्टिस अजय रस्तोगी ने केंद्र से अरुण गोयल की नियुक्ति से जुड़ी फाइल से मांगी है. उन्होंने केंद्र से पूछा है कि बताएं इस नियुक्ति की प्रक्रिया क्या रही है. क्या यह भर्ती किसी विशेष प्रक्रिया के तहत की गई है या फिर मिनिस्ट्री काउंसिल की अनुशंसा पर की गई है. संविधान के मुताबिक, मिनिस्ट्री काउंसिल ही चुनाव आयुक्त के लिए एक नाम प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को भेजती है. राष्ट्रपति उस पर मुहर लगाते हैं. हालांकि इस पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आना बाकी है.

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